हमारा उद्देश्य

समकालीन साहित्य की दशा और दिशा पर चिंतन के उपरान्त एक विचार ने जन्म लिया तब अस्तित्व में आया ई-पत्रिका “अक्षय गौरव” पंजीकृत (ISBN 2456-6950 ) को नये रूप में आपके समक्ष प्रस्तुत करने का उपाय। महीनों के अथक श्रम व चिंतन-प्रक्रिया ने हमें प्रेरित किया ” अक्षय गौरव” जैसा माध्यम आपके लिये उपलब्ध कराने और मूर्तरूप देने का संकल्प।

मानव जीवन में साहित्य का समावेश एक सतत परम्परा है। साहित्य अनायास ही अस्तित्व में नहीं आया बल्कि एक दीर्घ प्रक्रिया से गुज़रा हुआ आदर्श,सिद्धांत,आग्रह, संरचना और व्यवहार का मूर्तरूप है जिसमें संस्कृति और संस्कार की शाश्वत ख़ुशबू समायी है। श्रुत परम्परा से आगे बढ़ा साहित्य तो लिखित रूप में सामने आया। भाषा का आविर्भाव हुआ, विकास हुआ, व्याकरण विकसित हुआ। साहित्य हम सबके भीतर होता है लेकिन प्रकाश में लाने का अवसर हरेक के लिये सुलभ नहीं होता। दबी हुई वंचितों के रुदन की पीड़ा की अभिव्यक्ति ने साहित्य को मानवता के शिखर पर स्थापित किया है। पीड़ित के पक्ष में खड़े होकर साहित्य अहंकार और शक्तिशाली को ललकारता है इसीलिये साहित्य का सुर पीड़ित के पक्ष में मुखर हुआ है। हमारी सामूहिक चेतना को विकसित करना, अलसाई सम्वेदना को झिंझोड़ना और सामाजिक मूल्यों की स्थापना करते हुए समाज को दृष्टि देना, आईना दिखाना और अगली पीढ़ी को दक्ष बनाना साहित्य का मूल दायित्व है।

साहित्य के सम्वर्धन और सेवा की दिशा में हमारा प्रयास आपकी रचनात्मक सक्रियता से फलीभूत होगा ऐसा हमें यकीन है। नवोदित साहित्यकारों को प्रोत्साहित करने हेतु बहुआयामी प्रयोग व साहित्य सृजन में रूचि रखने वालों एवं साहित्यप्रेमियों को उत्कृष्ट कोटि की साहित्य-सामग्री उपलब्ध कराने का हमारा यत्न कितना सफल होता यह तो वक़्त के साथ दर्ज़ होता रहेगा।

हिन्दी के बदलते स्वरुप को सुग्राही बनाने, नये ज़माने की चुनौतियों को समझते हुए और भाषा के गौरव की स्थापना हेतु सम्भावनाओं को तलाशना ताकि मानक भाषा के प्रति नयी पीढ़ी को आकर्षित करते हुए हिन्दी-साहित्य की मोहक महक को बिखेरा जा सके और साहित्यिक मूल्यों पर चर्चा को मक़ाम तक पहुँचाया जा सके ताकि भाषा की जीवंतता अपना स्वाभाविक सफ़र तय करती रहे। रचनाकारों एवं सुधि पाठकों से अपेक्षित समर्थन एवं सहयोग मिलता रहेगा ऐसा हमें विश्वास है।

– रवींद्र सिंह यादव
संपादक